श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 122: युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनकी उत्पत्ति  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  1.122.44-45 
एष युद्धे महादेवं तोषयिष्यति शंकरम्।
अस्त्रं पाशुपतं नाम तस्मात् तुष्टादवाप्स्यति॥ ४४॥
निवातकवचा नाम दैत्या विबुधविद्विष:।
शक्राज्ञया महाबाहुस्तान् वधिष्यति ते सुत:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
'वह इस युद्ध में देवाधिदेव भगवान शिव को प्रसन्न करेगा और प्रसन्न होकर महेश्वर से पाशुपत नामक अस्त्र प्राप्त करेगा। निवातकवच नामक दैत्य देवताओं से सदैव द्वेष रखते हैं। आपका यह महाबाहु पुत्र इन्द्र की आज्ञा से उन समस्त दैत्यों का नाश करेगा।' 44-45
 
'He will please Lord Shiva, the lord of gods, in this war and after being pleased, he will obtain a weapon called Pashupat from Maheshwar. The demons called Nivatakavachas always hate the gods. This mighty-armed son of yours will destroy all those demons with the permission of Indra. 44-45.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)