Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.121.10-11: ‘जब मैं बालक था और अपने पिता के घर पर था, तब मुझे अतिथि सत्कार का कार्य सौंपा गया था। वहाँ मैंने एक उग्र स्वभाव वाले, कठोर व्रतधारी, धर्म के विषय में जिसका निश्चय अन्य लोगों को ज्ञात नहीं था और जिसे लोग दुर्वासा कहते हैं, ऐसे महापुरुष को मैंने संतुष्ट किया, जिसने अपने मन को सब प्रकार से वश में रखा था।॥ 10-11॥ | mahabharat अध्याय 1.121: पाण्डुका कुन्तीको समझाना और कुन्तीका पतिकी आज्ञासे पुत्रोत्पत्तिके लिये धर्मदेवताका आवाहन करनेके लिये उद्यत होना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
‘जब मैं बालक था और अपने पिता के घर पर था, तब मुझे अतिथि सत्कार का कार्य सौंपा गया था। वहाँ मैंने एक उग्र स्वभाव वाले, कठोर व्रतधारी, धर्म के विषय में जिसका निश्चय अन्य लोगों को ज्ञात नहीं था और जिसे लोग दुर्वासा कहते हैं, ऐसे महापुरुष को मैंने संतुष्ट किया, जिसने अपने मन को सब प्रकार से वश में रखा था।॥ 10-11॥
‘When I was a child and was at my father's house, I was entrusted with the task of welcoming guests. There I served a fierce-natured Brahmin who followed strict vows, whose determination about religion was unknown to others and whom people call Durvasa. I satisfied that great soul who had kept his mind under control by all means.॥ 10-11॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥