पितृदेवर्षिमनुजैर्देयं तेभ्यश्च धर्मत:।
एतानि तु यथाकालं यो न बुध्यति मानव:॥ १८॥
न तस्य लोका: सन्तीति धर्मविद्भि: प्रतिष्ठितम्।
यज्ञैस्तु देवान् प्रीणाति स्वाध्यायतपसा मुनीन्॥ १९॥
अनुवाद
(उन ऋणों के नाम हैं-) पितृ ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण और मनुष्य ऋण। हमें इन सभी ऋणों को धर्मानुसार चुकाना चाहिए। जो व्यक्ति समय पर इन ऋणों को नहीं चुकाता, उसे पुण्यलोक सुलभ नहीं होता। यह सीमा धर्म को जानने वाले पुरुषों ने स्थापित की है। मनुष्य यज्ञों द्वारा देवताओं को संतुष्ट करता है और स्वाध्याय तथा तप द्वारा ऋषियों को संतुष्ट करता है। ॥18-19॥
(The names of those debts are-) debt to ancestors, debt to gods, debt to sages and debt to humans. We must repay all these debts as per Dharma. The virtuous world is not accessible to the person who does not pay these debts in time. This limit has been established by the men who know Dharma. Man satisfies the gods through sacrifices, and satisfies the sages through self-study and penance. ॥18-19॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥