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mahabharat 1.119.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! वहाँ भी महान तप में तत्पर महाबली राजा पाण्डु सिद्धों और भाटों के समुदाय को बहुत प्रिय हो गए - उन्हें देखते ही वे प्रसन्न हो गए॥1॥   |   mahabharat अध्याय 1.119: पाण्डुका कुन्तीको पुत्र-प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 119: पाण्डुका कुन्तीको पुत्र-प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका आदेश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  1.119.1 
वैशम्पायन उवाच
तत्रापि तपसि श्रेष्ठे वर्तमान: स वीर्यवान्।
सिद्धचारणसङ्घानां बभूव प्रियदर्शन:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! वहाँ भी महान तप में तत्पर महाबली राजा पाण्डु सिद्धों और भाटों के समुदाय को बहुत प्रिय हो गए - उन्हें देखते ही वे प्रसन्न हो गए॥1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! There too, the mighty King Pandu, who was engaged in great penance, became very dear to the community of Siddhas and bards – they became happy the moment they saw him. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)