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mahabharat 1.118.7-8: मैं निश्चय ही अपने तन और मन को अत्यन्त कठोर तपस्या में लगाऊँगा। अतः अब मैं प्रत्येक वृक्ष के नीचे फल भिक्षा माँगूँगा, अकेला (पत्नीविहीन) और एकान्त (यहाँ तक कि नौकर-चाकरों आदि से भी दूर) रहूँगा। मैं अपना सिर मुंडवाकर मौन तपस्वी बनूँगा और इन वानप्रस्थियों के आश्रमों में विचरण करूँगा। उस समय मेरा शरीर धूल से आच्छादित होगा और मेरा निवास एकान्त और निर्जन स्थान में होगा। 7-8   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  1.118.7-8 
अतीव तपसाऽऽत्मानं योजयिष्याम्यसंशयम्।
तस्मादेकोऽहमेकाकी एकैकस्मिन् वनस्पतौ॥ ७॥
चरन् भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डश्चरिष्याम्याश्रमानिमान्।
पांसुना समवच्छन्न: शून्यागारकृतालय:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
मैं निश्चय ही अपने तन और मन को अत्यन्त कठोर तपस्या में लगाऊँगा। अतः अब मैं प्रत्येक वृक्ष के नीचे फल भिक्षा माँगूँगा, अकेला (पत्नीविहीन) और एकान्त (यहाँ तक कि नौकर-चाकरों आदि से भी दूर) रहूँगा। मैं अपना सिर मुंडवाकर मौन तपस्वी बनूँगा और इन वानप्रस्थियों के आश्रमों में विचरण करूँगा। उस समय मेरा शरीर धूल से आच्छादित होगा और मेरा निवास एकान्त और निर्जन स्थान में होगा। 7-8
 
I will certainly engage my body and mind in very severe penance. Therefore, now I will beg alms of fruits under each tree, living alone (without a wife) and isolated (even away from servants etc.). I will shave my head and become a silent ascetic and roam in the ashrams of these Vanaprasthis. At that time my body will be covered with dust and my abode will be in a lonely and solitary place. 7-8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)