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mahabharat 1.118.6: अतः अब मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि मोक्ष मार्ग पर चलना ही मेरे कल्याण का एकमात्र उपाय है। पत्नी-पुत्र आदि का बंधन सबसे बड़ा दुःख है। आज से मैं अपने पिता वेदव्यासजी के सद् उपदेशों का पालन करूँगा, जिनसे पुण्य का कभी नाश नहीं होता।   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.118.6 
मोक्षमेव व्यवस्यामि बन्धो हि व्यसनं महत्।
सुवृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
अतः अब मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि मोक्ष मार्ग पर चलना ही मेरे कल्याण का एकमात्र उपाय है। पत्नी-पुत्र आदि का बंधन सबसे बड़ा दुःख है। आज से मैं अपने पिता वेदव्यासजी के सद् उपदेशों का पालन करूँगा, जिनसे पुण्य का कभी नाश नहीं होता।
 
So, now I have come to the conclusion that walking on the path of salvation is the only way to achieve my welfare. The bondage of wife and son etc. is the greatest sorrow. From today onwards, I will follow the good teachings of my father Ved Vyasji, which never destroys virtue.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)