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mahabharat 1.118.5: मैं शिकार के पीछे भागता रहता हूँ; ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी अनीति के कारण देवताओं ने मुझे त्याग दिया है। इसीलिए ऐसे पवित्र कुल में जन्म लेने पर भी आज मेरी बुद्धि विकारों में फँसकर इतनी क्षीण हो गई है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.118.5 
तस्याद्य व्यसने बुद्धि: संजातेयं ममाधमा।
त्यक्तस्य देवैरनयान्मृगयां परिधावत:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
मैं शिकार के पीछे भागता रहता हूँ; ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी अनीति के कारण देवताओं ने मुझे त्याग दिया है। इसीलिए ऐसे पवित्र कुल में जन्म लेने पर भी आज मेरी बुद्धि विकारों में फँसकर इतनी क्षीण हो गई है ॥5॥
 
I keep running after the prey; it seems that because of my immorality, the gods have abandoned me. That is why, even after being born in such a pure family, my intellect has become so low today by getting entangled in vices. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)