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mahabharat 1.118.49-50: महाराज! उस समय महाभूत, सिद्ध और महर्षि उनकी रक्षा करते थे। वे ऊँची-नीची भूमि पर शयन करते थे। इन्द्रद्युम्न सरोवर और फिर हंसकूट को पार करके वे शतश्रृंग पर्वत पर पहुँचे। जनमेजय! वहाँ उन्होंने तपस्वी जीवन व्यतीत किया और घोर तपस्या में लीन हो गए। 49-50।   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 49-50
 
 
श्लोक  1.118.49-50 
रक्ष्यमाणो महाभूतै: सिद्धैश्च परमर्षिभि:।
उवास स महाराज समेषु विषमेषु च॥ ४९॥
इन्द्रद्युम्नसर: प्राप्य हंसकूटमतीत्य च।
शतशृङ्गे महाराज तापस: समतप्यत॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उस समय महाभूत, सिद्ध और महर्षि उनकी रक्षा करते थे। वे ऊँची-नीची भूमि पर शयन करते थे। इन्द्रद्युम्न सरोवर और फिर हंसकूट को पार करके वे शतश्रृंग पर्वत पर पहुँचे। जनमेजय! वहाँ उन्होंने तपस्वी जीवन व्यतीत किया और घोर तपस्या में लीन हो गए। 49-50।
 
Maharaj! At that time Mahabhuta, Siddha and Maharishis used to protect him. He used to sleep on high and low ground. After reaching Indradyumna lake and then crossing Hansakuta, he reached Shatashringa mountain. Janamejaya! There he lived an ascetic life and got involved in severe penance. 49-50.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)