vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 1: आदि पर्व
»
अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश
»
श्लोक 47
श्लोक
1.118.47
राजपुत्रस्तु कौरव्य पाण्डुर्मूलफलाशन:।
जगाम सह पत्नीभ्यां ततो नागशतं गिरिम्॥ ४७॥
अनुवाद
जनमेजय! राजकुमार पाण्डु कंद-मूल और फल खाते हुए अपनी दोनों पत्नियों के साथ वहाँ से नागशत नामक पर्वत पर चले गये।
Janamejaya! Prince Pandu, eating roots and fruits, went from there with his two wives to the mountain called Nagashat.
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas