श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.118.45 
श्रुत्वा तेभ्यस्तत: सर्वं यथावृत्तं महावने।
धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठ: पाण्डुमेवान्वशोचत॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर उन सेवकों से उस महान् वन में पाण्डु के साथ घटित हुई सारी घटनाएँ सुनकर, पुरुषों में श्रेष्ठ धृतराष्ट्र पाण्डु के लिए दुःखी और चिन्तित रहने लगे ॥ 45॥
 
Then, after hearing from those servants all the events that had happened with Pandu in that great forest, that best of men, Dhritarashtra, remained sad and worried about Pandu. ॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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