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mahabharat 1.118.41-42: भरतसिंह पाण्डु के ये विचित्र और करुणापूर्ण वचन सुनकर उनके सभी अनुयायी और सेवक भय से चिल्लाने और विलाप करने लगे ॥41-42॥   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  1.118.41-42 
ततस्तस्यानुयातारस्ते चैव परिचारका:॥ ४१॥
श्रुत्वा भरतसिंहस्य विविधा: करुणा गिर:।
भीममार्तस्वरं कृत्वा हाहेति परिचुक्रुशु:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
भरतसिंह पाण्डु के ये विचित्र और करुणापूर्ण वचन सुनकर उनके सभी अनुयायी और सेवक भय से चिल्लाने और विलाप करने लगे ॥41-42॥
 
On hearing these strange and compassionate words of Bharat Singh Pandu, all his followers and servants began to cry out in fear and wailing. ॥41-42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)