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mahabharat 1.118.38-39: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कुरुवंश को सुख पहुँचाने वाले राजा पाण्डु ने अपनी दोनों पत्नियों से इस प्रकार कहकर अपना शिरोभूषण, निष्क, बाजूबंद, कुण्डल और बहुमूल्य वस्त्र तथा माद्री और कुन्ती के आभूषण भी उतारकर सब ब्राह्मणों को दे दिए। फिर उन्होंने अपने सेवकों से इस प्रकार कहा -॥38-39॥   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  1.118.38-39 
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा भार्ये ते राजा कौरवनन्दन:।
ततश्चूडामणिं निष्कमङ्गदे कुण्डलानि च॥ ३८॥
वासांसि च महार्हाणि स्त्रीणामाभरणानि च।
प्रदाय सर्वं विप्रेभ्य: पाण्डु: पुनरभाषत॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कुरुवंश को सुख पहुँचाने वाले राजा पाण्डु ने अपनी दोनों पत्नियों से इस प्रकार कहकर अपना शिरोभूषण, निष्क, बाजूबंद, कुण्डल और बहुमूल्य वस्त्र तथा माद्री और कुन्ती के आभूषण भी उतारकर सब ब्राह्मणों को दे दिए। फिर उन्होंने अपने सेवकों से इस प्रकार कहा -॥38-39॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! King Pandu, who makes the Kuru clan happy, after speaking thus to his two wives, took off his headgear, nishka (chest ornaments), armlets, earrings and precious clothes and also the ornaments of Madri and Kunti and gave them to all the Brahmins. Then he said thus to his servants -॥ 38-39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)