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mahabharat 1.118.36: मैं वानप्रस्थ आश्रम में रहने वालों को अथवा अपने परिवार के सदस्यों को भी न देखूँगा और न ही उन्हें अप्रसन्न करूँगा; फिर ग्रामवासियों का क्या होगा?॥ 36॥   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.118.36 
वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनाम्।
नाप्रियाण्याचरिष्यामि किं पुनर्ग्रामवासिनाम्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
मैं वानप्रस्थ आश्रम में रहने वालों को अथवा अपने परिवार के सदस्यों को भी न देखूँगा और न ही उन्हें अप्रसन्न करूँगा; फिर ग्रामवासियों का क्या होगा?॥ 36॥
 
I will not see or displease even the people living in the Vanaprastha Ashram or my family members; then what about the villagers?॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)