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mahabharat 1.118.33: मैं स्नान करूँगा, संध्यावंदन करूँगा और दिन में दो बार अग्निहोत्र करूँगा। मैं चिथड़े, मृगचर्म और जटाएँ धारण करूँगा। मैं बहुत कम भोजन करूँगा और शरीर से दुर्बल हो जाऊँगा।॥ 33॥   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.118.33 
अग्नौ जुह्वन्नुभौ कालावुभौ कालावुपस्पृशन्।
कृश: परिमिताहारश्चीरचर्मजटाधर:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
मैं स्नान करूँगा, संध्यावंदन करूँगा और दिन में दो बार अग्निहोत्र करूँगा। मैं चिथड़े, मृगचर्म और जटाएँ धारण करूँगा। मैं बहुत कम भोजन करूँगा और शरीर से दुर्बल हो जाऊँगा।॥ 33॥
 
I will bathe, perform evening prayers and perform Agnihotra twice a day. I will wear rags, deerskin and matted hair. I will eat very little food and become physically weak.॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)