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mahabharat 1.118.32: मैं सांसारिक सुखों और भोजन का त्याग करके घोर तपस्या में लग जाऊँगा। मैं छाल के वस्त्र धारण करके तथा फल-मूल खाकर महान वन में विचरण करूँगा।   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.118.32 
त्यक्त्वा ग्राम्यसुखाहारं तप्यमानो महत् तप:।
वल्कली फलमूलाशी चरिष्यामि महावने॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
मैं सांसारिक सुखों और भोजन का त्याग करके घोर तपस्या में लग जाऊँगा। मैं छाल के वस्त्र धारण करके तथा फल-मूल खाकर महान वन में विचरण करूँगा।
 
Giving up the pleasures and food of worldly pleasures, I will engage in severe austerity. Wearing bark clothes and eating fruits and roots, I will roam in the great forest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)