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mahabharat 1.118.27: हे भरतश्रेष्ठ! संन्यास के अतिरिक्त और भी आश्रम हैं, जहाँ आप हम धर्मपरायण पत्नियों के साथ घोर तप कर सकते हैं॥ 27॥   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.118.27 
अन्येऽपि ह्याश्रमा: सन्ति ये शक्या भरतर्षभ।
आवाभ्यां धर्मपत्नीभ्यां सह तप्तुं तपो महत्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! संन्यास के अतिरिक्त और भी आश्रम हैं, जहाँ आप हम धर्मपरायण पत्नियों के साथ घोर तप कर सकते हैं॥ 27॥
 
'O best of the Bharatas! Besides Sannyasa, there are other ashramas also, where you can perform severe penance along with us, your pious wives.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)