श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.118.2 
पाण्डुरुवाच
सतामपि कुले जाता: कर्मणा बत दुर्गतिम्।
प्राप्नुवन्त्यकृतात्मान: कामजालविमोहिता:॥ २॥
 
 
अनुवाद
पाण्डु बोले - यह बड़े खेद की बात है कि श्रेष्ठ पुरुषों के कुल में उत्पन्न हुए मनुष्य भी अपने विवेक पर नियंत्रण न होने के कारण काम के जाल में फँसकर अपनी बुद्धि खो देते हैं और गलत कर्म करके महान दुर्गति को प्राप्त होते हैं॥ 2॥
 
Pandu said - It is a matter of regret that even those born in noble families of noble men, due to lack of control over their conscience, get entangled in the snare of lust and lose their wisdom and by committing wrong deeds, fall into great misery.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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