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श्लोक 1.118.19  |
निर्मुक्त: सर्वपापेभ्यो व्यतीत: सर्ववागुरा:।
न वशे कस्यचित् तिष्ठन् सधर्मा मातरिश्वन:॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| मैं समस्त पापों से मुक्त हो जाऊँगा और अज्ञानजन्य समस्त बंधनों से पार हो जाऊँगा। मैं किसी के वश में न रहकर वायु की भाँति सर्वत्र विचरण करूँगा।॥19॥ |
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| I shall be free from all sins and shall transcend all bonds born of ignorance. I shall roam everywhere like the wind, being not under anybody's control.॥ 19॥ |
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