श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  1.118.13-14 
असम्भवे वा भैक्ष्यस्य चरन्ननशनान्यपि।
अल्पमल्पं च भुञ्जान: पूर्वालाभे न जातुचित्॥ १३॥
अन्यान्यपि चरँल्लोभादलाभे सप्त पूरयन्।
अलाभे यदि वा लाभे समदर्शी महातपा:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
अथवा यदि भिक्षा मिलना असम्भव हो जाए, तो मैं कई दिनों तक उपवास करूँगा। (यदि भिक्षा मिल भी जाए तो) थोड़ा-थोड़ा ही भोजन करूँगा। यदि ऊपर बताए गए किसी एक उपाय से भिक्षा न मिले, तो दूसरा उपाय करूँगा। ऐसा कभी नहीं होगा कि लोभ के कारण मैं अनेक घरों में भिक्षा माँगने जाऊँ। यदि मुझे कहीं कुछ न मिले, तो मैं अपनी भिक्षा पूरी करने के लिए सात घरों में जाऊँगा। यदि मिले, तो और यदि न मिले, तो भी दोनों ही स्थितियों में समान दृष्टि रखते हुए मैं कठोर तप करता रहूँगा।॥13-14॥
 
Or if it becomes impossible to get alms, I will fast for several days. (Even if I get alms) I will eat only small amounts of food. If I do not get alms in one of the ways mentioned above, I will resort to the other. It will never happen that out of greed I go to many houses to beg alms. If I do not get anything anywhere, I will visit seven houses to fulfill my alms. If I get it and if I do not get it, I will continue to do severe penance, keeping the same view in both the situations.॥13-14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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