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mahabharat 1.118.10: मैं न तो आशीर्वाद चाहूँगा, न नमस्कार चाहूँगा। मैं सुख-दुःख के द्वंद्व से मुक्त रहूँगा और परिग्रह से दूर रहूँगा। मैं न तो किसी का उपहास करूँगा और न क्रोध से किसी पर भौंहें चढ़ाऊँगा।॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.118.10 
निराशीर्निर्नमस्कारो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रह:।
न चाप्यवहसन् कच्चिन्न कुर्वन् भ्रुकुटीं क्वचित्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मैं न तो आशीर्वाद चाहूँगा, न नमस्कार चाहूँगा। मैं सुख-दुःख के द्वंद्व से मुक्त रहूँगा और परिग्रह से दूर रहूँगा। मैं न तो किसी का उपहास करूँगा और न क्रोध से किसी पर भौंहें चढ़ाऊँगा।॥10॥
 
I will neither desire blessings nor salutations. I will be free from the dilemmas of happiness and sorrow and will stay away from possessions. I will neither make fun of anyone nor will I raise my eyebrows at anyone in anger.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)