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mahabharat 1.117.9-10: मृग बोला - हे राजन! जो मनुष्य काम और क्रोध से घिरे हुए हैं, बुद्धि से रहित हैं और पापों में लिप्त हैं, वे भी ऐसे क्रूर कर्मों का त्याग कर देते हैं। बुद्धि भाग्य को नहीं निगल सकती, भाग्य ही बुद्धि को निगल जाता है (भ्रष्ट कर देता है)। बुद्धिमान पुरुष भी भाग्य से प्राप्त होने वाली वस्तुओं को नहीं जान सकता॥ 9-10॥   |   mahabharat अध्याय 1.117: राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 117: राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  1.117.9-10 
मृग उवाच
काममन्युपरीता हि बुद्धॺा विरहिता अपि।
वर्जयन्ति नृशंसानि पापेष्वपि रता नरा:॥ ९॥
न विधिं ग्रसते प्रज्ञा प्रज्ञां तु ग्रसते विधि:।
विधिपर्यागतानर्थान् प्राज्ञो न प्रतिपद्यते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मृग बोला - हे राजन! जो मनुष्य काम और क्रोध से घिरे हुए हैं, बुद्धि से रहित हैं और पापों में लिप्त हैं, वे भी ऐसे क्रूर कर्मों का त्याग कर देते हैं। बुद्धि भाग्य को नहीं निगल सकती, भाग्य ही बुद्धि को निगल जाता है (भ्रष्ट कर देता है)। बुद्धिमान पुरुष भी भाग्य से प्राप्त होने वाली वस्तुओं को नहीं जान सकता॥ 9-10॥
 
The deer said - O King! Those men who are surrounded by lust and anger, are bereft of wisdom and are involved in sins, they too give up such cruel deeds. The intellect cannot swallow destiny, destiny itself swallows the intellect (corrupts it). Even an intelligent man cannot know the things obtained by destiny.॥ 9-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)