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mahabharat 1.117.5: वैशम्पायन बोले, "जनमेजय! एक बार राजा पाण्डु मृगों और सर्पों से भरे एक विशाल वन में विचरण कर रहे थे। उन्होंने एक नर मृग को एक मादा मृगी के साथ समागम करते देखा।   |   mahabharat अध्याय 1.117: राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 117: राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.117.5 
वैशम्पायन उवाच
राजा पाण्डुर्महारण्ये मृगव्यालनिषेविते।
चरन् मैथुनधर्मस्थं ददर्श मृगयूथपम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन बोले, "जनमेजय! एक बार राजा पाण्डु मृगों और सर्पों से भरे एक विशाल वन में विचरण कर रहे थे। उन्होंने एक नर मृग को एक मादा मृगी के साथ समागम करते देखा।
 
Vaishampayana said, 'Janamejaya! Once King Pandu was roaming in a huge forest inhabited by deer and snakes. He saw a male deer who was mating with a female deer.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)