Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.117.25-26: हे पुरुषश्रेष्ठ! मैं फल-मूल पर निर्भर रहने वाला ऋषि हूँ। मैंने मृग का रूप धारण किया है और मैं सदैव वन में रहकर शांति और अनुशासन के नियमों का पालन करने में तत्पर रहता हूँ। मुझ निरपराध को मारकर तुम्हें क्या लाभ हुआ? तुमने मुझे मारा है, इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूँ॥ 25-26॥ | mahabharat अध्याय 1.117: राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
हे पुरुषश्रेष्ठ! मैं फल-मूल पर निर्भर रहने वाला ऋषि हूँ। मैंने मृग का रूप धारण किया है और मैं सदैव वन में रहकर शांति और अनुशासन के नियमों का पालन करने में तत्पर रहता हूँ। मुझ निरपराध को मारकर तुम्हें क्या लाभ हुआ? तुमने मुझे मारा है, इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूँ॥ 25-26॥
O best of men! I am a sage who lives on fruits and roots. I have taken the form of a deer and am always in the forests, always ready to follow the rules of peace and discipline. What did you gain by killing me, an innocent person? You have killed me, so I curse you in return.॥ 25-26॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥