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mahabharat 1.117.22: भारत अत्यंत कठोर कर्म समस्त लोकों में निन्दित है। वह स्वर्ग और यश की हानि करने वाला है। इसके अतिरिक्त वह महान पाप है। 22॥   |   mahabharat अध्याय 1.117: राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 117: राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.117.22 
नृशंसं कर्म सुमहत् सर्वलोकविगर्हितम्।
अस्वर्ग्यमयशस्यं चाप्यधर्मिष्ठं च भारत॥ २२॥
 
 
अनुवाद
भारत अत्यंत कठोर कर्म समस्त लोकों में निन्दित है। वह स्वर्ग और यश की हानि करने वाला है। इसके अतिरिक्त वह महान पाप है। 22॥
 
India Extremely harsh actions are condemned in all the worlds. He is going to cause harm to heaven and fame. Apart from this, it is a great sin. 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)