Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.117.18: हिरणी बोली - हे राजन! मैं तुम्हें हिरण की हत्या का दोषी नहीं ठहरा रही हूँ, क्योंकि मैं स्वयं मारी गई थी। मैं तो केवल इतना कहना चाहती हूँ कि तुम्हें दया का आश्रय लेकर मेरे संभोग समाप्त होने तक प्रतीक्षा करनी चाहिए थी।   |   mahabharat अध्याय 1.117: राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 117: राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.117.18 
मृग उवाच
नाहं घ्नन्तं मृगान् राजन् विगर्हे चात्मकारणात्।
मैथुनं तु प्रतीक्ष्यं मे त्वयेहाद्यानृशंस्यत:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हिरणी बोली - हे राजन! मैं तुम्हें हिरण की हत्या का दोषी नहीं ठहरा रही हूँ, क्योंकि मैं स्वयं मारी गई थी। मैं तो केवल इतना कहना चाहती हूँ कि तुम्हें दया का आश्रय लेकर मेरे संभोग समाप्त होने तक प्रतीक्षा करनी चाहिए थी।
 
The deer said - O King! I am not blaming you for killing deer because I was killed. I just want to say that you should have taken shelter of compassion and waited till I finished my sexual intercourse.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)