श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 117: राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.117.13 
अच्छद्मना मायया च मृगाणां वध इष्यते।
स एव धर्मो राज्ञां तु तद्धि त्वं किं नु गर्हसे॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मृग का प्रकट अथवा गुप्त रूप से वध करना हमारे लिए वांछनीय है। राजाओं के लिए यह धर्म है, फिर तुम इसकी निन्दा कैसे कर सकते हो?॥13॥
 
Killing of deer, openly or secretly, is desirable for us. It is Dharma for kings, then how can you criticize it?॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)