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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 114: धृतराष्ट्रके गान्धारीसे एक सौ पुत्र तथा एक कन्याकी तथा सेवा करनेवाली वैश्यजातीय युवतीसे युयुत्सु नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.114.20 
वैशम्पायन उवाच
सा सिच्यमाना त्वष्ठीला बभूव शतधा तदा।
अङ्गुष्ठपर्वमात्राणां गर्भाणां पृथगेव तु॥ २०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! उस समय जब मांस का जल पिया गया, तो वह सौ टुकड़ों में टूट गया। वे सौ गर्भों में परिवर्तित हो गए, जिनमें से प्रत्येक का आकार अंगूठे के छिद्र के बराबर था।
 
Vaishampayana says - Janamejaya! When the flesh was watered at that time, it broke into hundred pieces. They transformed into hundred wombs, each equal to the size of the thumb's pores.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)