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mahabharat 1.114.18: मैंने कभी हँसी-मजाक में भी झूठ नहीं बोला। फिर वरदान आदि अवसरों पर कहे गए मेरे वचन झूठे कैसे हो सकते हैं? तुम शीघ्र ही सौ कुण्ड (तालाब) तैयार करवाकर उनमें घी भर दो॥18॥   |   mahabharat अध्याय 1.114: धृतराष्ट्रके गान्धारीसे एक सौ पुत्र तथा एक कन्याकी तथा सेवा करनेवाली वैश्यजातीय युवतीसे युयुत्सु नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 114: धृतराष्ट्रके गान्धारीसे एक सौ पुत्र तथा एक कन्याकी तथा सेवा करनेवाली वैश्यजातीय युवतीसे युयुत्सु नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.114.18 
वितथं नोक्तपूर्वं मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा।
घृतपूर्णं कुण्डशतं क्षिप्रमेव विधीयताम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
मैंने कभी हँसी-मजाक में भी झूठ नहीं बोला। फिर वरदान आदि अवसरों पर कहे गए मेरे वचन झूठे कैसे हो सकते हैं? तुम शीघ्र ही सौ कुण्ड (तालाब) तैयार करवाकर उनमें घी भर दो॥18॥
 
I have never spoken a lie even in jest. Then how can my words spoken on other occasions like boons etc. be false? You should quickly get a hundred pots (ponds) prepared and fill them with ghee.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)