Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.110.d12-d13: कवच और कुण्डल लेने के अपने कार्य से संतुष्ट होकर इन्द्र ने मन ही मन हँसते हुए कहा, 'ओह! यह तो बड़ा ही साहसपूर्ण कार्य है। मैं तो देवता, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षसों में से किसी को भी इतना साहसी नहीं देखता। भला, ऐसा कार्य कौन कर सकता है?' यह कहकर उन्होंने स्पष्ट वाणी में कहा, 'वीर! मैं तुम्हारे इस कार्य से प्रसन्न हूँ, अतः मुझसे जो चाहो वर माँग लो।' | mahabharat अध्याय 1.110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
कवच और कुण्डल लेने के अपने कार्य से संतुष्ट होकर इन्द्र ने मन ही मन हँसते हुए कहा, 'ओह! यह तो बड़ा ही साहसपूर्ण कार्य है। मैं तो देवता, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षसों में से किसी को भी इतना साहसी नहीं देखता। भला, ऐसा कार्य कौन कर सकता है?' यह कहकर उन्होंने स्पष्ट वाणी में कहा, 'वीर! मैं तुम्हारे इस कार्य से प्रसन्न हूँ, अतः मुझसे जो चाहो वर माँग लो।'
Satisfied with his act of taking the armour and earrings, Indra said laughingly to himself, 'Oh! This is a very courageous act. I do not see any of the gods, demons, Yakshas, Gandharvas, serpents and demons so courageous. Well, who can do such a task?' Saying this, he said in a clear voice, 'Valiant! I am pleased with your act, so ask for any boon you want from me.'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥