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mahabharat 1.110.3: पहले उनके यहाँ एक कन्या उत्पन्न हुई, तो उनके मित्र शूरसेन ने उस कन्या को अपने परम मित्र राजा कुंतीभोज को दे दिया, जो उनसे अनुग्रह चाहते थे।   |   mahabharat अध्याय 1.110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.110.3 
अग्रजामथ तां कन्यां शूरोऽनुग्रहकाङ्क्षिणे।
प्रददौ कुन्तिभोजाय सखा सख्ये महात्मने॥ ३॥
 
 
अनुवाद
पहले उनके यहाँ एक कन्या उत्पन्न हुई, तो उनके मित्र शूरसेन ने उस कन्या को अपने परम मित्र राजा कुंतीभोज को दे दिया, जो उनसे अनुग्रह चाहते थे।
 
First a girl was born to him. So his friend Shursena gave the girl to his great friend King Kunti Bhoja who desired his favours.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)