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mahabharat 1.110.28: तब कर्ण ने हाथ जोड़कर अपने शरीर के साथ उत्पन्न हुए कवच को अपने शरीर से अलग करके तथा अपनी दोनों कुण्डलियाँ काटकर भगवान इन्द्र को दे दी। 28.   |   mahabharat अध्याय 1.110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.110.28 
स्वशरीरात् समुत्कृत्य कवचं स्वं निसर्गजम्।
कर्णस्तु कुण्डले छित्त्वा प्रायच्छत् स कृताञ्जलि:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
तब कर्ण ने हाथ जोड़कर अपने शरीर के साथ उत्पन्न हुए कवच को अपने शरीर से अलग करके तथा अपनी दोनों कुण्डलियाँ काटकर भगवान इन्द्र को दे दी। 28.
 
Then Karna, with folded hands, gave to Lord Indra the armour that was born along with his body, after tearing it off from his body and also cutting off his two earrings. 28.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)