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mahabharat 1.110.26: उस समय मन्त्र जप में तत्पर वीर एवं बुद्धिमान कर्ण के लिए इस पृथ्वी पर ऐसी कोई वस्तु नहीं थी, जिसे मांगने पर वह ब्राह्मणों को न दे सके।   |   mahabharat अध्याय 1.110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  1.110.26 
तस्मिन् काले तु जपतस्तस्य वीरस्य धीमत:।
नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत् किंचिद् वसु महीतले॥ २६॥
 
 
अनुवाद
उस समय मन्त्र जप में तत्पर वीर एवं बुद्धिमान कर्ण के लिए इस पृथ्वी पर ऐसी कोई वस्तु नहीं थी, जिसे मांगने पर वह ब्राह्मणों को न दे सके।
 
At that time, for the brave and intelligent Karna who was engaged in chanting mantras, there was nothing on this earth that he could not give to the Brahmins if asked for it. 26.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)