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mahabharat 1.110.21: उस नवजात शिशु को देखकर वृष्णिवंश की कन्या कुन्ती मन में बहुत दुःखी हुई और एकाग्रचित्त होकर सोचने लगी कि अब मैं क्या करूँ जिससे इसका अच्छा परिणाम हो सके॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 1.110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.110.21 
दृष्ट्वा कुमारं जातं सा वार्ष्णेयी दीनमानसा।
एकाग्रं चिन्तयामास किं कृत्वा सुकृतं भवेत्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
उस नवजात शिशु को देखकर वृष्णिवंश की कन्या कुन्ती मन में बहुत दुःखी हुई और एकाग्रचित्त होकर सोचने लगी कि अब मैं क्या करूँ जिससे इसका अच्छा परिणाम हो सके॥ 21॥
 
Seeing that newborn child, Kunti, the daughter of the Vrishni clan, felt very sad in her heart. She thought with full concentration about what she could do now to bring about a good result.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)