Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.110.16: यशस्वी कुन्ती अपने भाइयों और बन्धु-बान्धवों में फैलने वाली अपकीर्ति से भयभीत थी और स्त्री के स्वाभाविक लज्जा से भी विवश थी। हे भरतश्रेष्ठ! उस समय सूर्यदेव ने उससे पुनः कहा -॥16॥ | mahabharat अध्याय 1.110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
बन्धुपक्षभयाद् भीता लज्जया च यशस्विनी।
तामर्क: पुनरेवेदमब्रवीद् भरतर्षभ॥ १६॥
अनुवाद
यशस्वी कुन्ती अपने भाइयों और बन्धु-बान्धवों में फैलने वाली अपकीर्ति से भयभीत थी और स्त्री के स्वाभाविक लज्जा से भी विवश थी। हे भरतश्रेष्ठ! उस समय सूर्यदेव ने उससे पुनः कहा -॥16॥
Famed Kunti was afraid of the infamy spreading among her brothers and relatives and was also constrained by the natural shyness of a woman. O best of the Bharatas! At that time the Sun God again said to her -॥16॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥