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mahabharat 1.110.14: शुभ! मेरे दर्शन अमोघ हैं और तूने मेरा आह्वान किया है। हे कायर! यदि यह आह्वान व्यर्थ हुआ, तो निःसंदेह तू ही इसका दोषी होगा। 14।   |   mahabharat अध्याय 1.110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.110.14 
अमोघं दर्शनं मह्यमाहूतश्चास्मि ते शुभे।
वृथाह्वानेऽपि ते भीरु दोष: स्यान्नात्र संशय:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
शुभ! मेरे दर्शन अमोघ हैं और तूने मेरा आह्वान किया है। हे कायर! यदि यह आह्वान व्यर्थ हुआ, तो निःसंदेह तू ही इसका दोषी होगा। 14।
 
Shubh! My darshan is infallible and you have invoked me. O coward! If this invocation goes in vain, then you will undoubtedly be blamed for it. 14.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)