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mahabharat 1.110.12: यद्यपि मैंने यह अपराध किया है, फिर भी मैं आपके चरणों में सिर झुकाकर प्रार्थना करती हूँ कि आप मुझे क्षमा करें और प्रसन्न हों। स्त्रियाँ यदि अपराध भी करें, तो भी सज्जन पुरुषों को सदैव उनकी रक्षा करनी चाहिए। ॥12॥   |   mahabharat अध्याय 1.110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.110.12 
एतस्मिन्नपराधे त्वां शिरसाहं प्रसादये।
योषितो हि सदा रक्ष्या: स्वापराद्धापि नित्यश:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैंने यह अपराध किया है, फिर भी मैं आपके चरणों में सिर झुकाकर प्रार्थना करती हूँ कि आप मुझे क्षमा करें और प्रसन्न हों। स्त्रियाँ यदि अपराध भी करें, तो भी सज्जन पुरुषों को सदैव उनकी रक्षा करनी चाहिए। ॥12॥
 
Although I have committed this crime, I bow my head at your feet and pray that you forgive me and be pleased. Even if women commit a crime, noble men should always protect them. ॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)