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mahabharat 1.110.11: कुंती बोली - हे शत्रुओं का नाश करने वाले प्रभु! एक ब्राह्मण ने मुझे देवताओं का आह्वान करने का वरदान दिया है। मैंने उसकी परीक्षा लेने के लिए आपका आह्वान किया है।   |   mahabharat अध्याय 1.110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.110.11 
कुन्त्युवाच
कश्चिन्मे ब्राह्मण: प्रादाद् वरं विद्यां च शत्रुहन्।
तद्विजिज्ञासयाऽऽह्वानं कृतवत्यस्मि ते विभो॥ ११॥
 
 
अनुवाद
कुंती बोली - हे शत्रुओं का नाश करने वाले प्रभु! एक ब्राह्मण ने मुझे देवताओं का आह्वान करने का वरदान दिया है। मैंने उसकी परीक्षा लेने के लिए आपका आह्वान किया है।
 
Kunti said - O Lord, destroyer of enemies! A Brahmin has given me a boon to invoke the gods. I invoked you to test him. 11.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)