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mahabharat 1.11.4: 'अरे! तुमने मुझे डराने के लिए एक दुर्बल सर्प उत्पन्न किया था। मेरे शाप के कारण तुम्हें भी दुर्बल सर्प बनना पड़ेगा।' ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 1.11: डुण्डुभकी आत्मकथा तथा उसके द्वारा रुरुको अहिंसाका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 11: डुण्डुभकी आत्मकथा तथा उसके द्वारा रुरुको अहिंसाका उपदेश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.11.4 
यथावीर्यस्त्वया सर्प: कृतोऽयं मद्‍‍बिभीषया।
तथावीर्यो भुजङ्गस्त्वं मम शापाद् भविष्यसि॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'अरे! तुमने मुझे डराने के लिए एक दुर्बल सर्प उत्पन्न किया था। मेरे शाप के कारण तुम्हें भी दुर्बल सर्प बनना पड़ेगा।' ॥4॥
 
'Oh! You had created a weak snake to scare me. Due to my curse you will also have to become a weak snake.' ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)