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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 108: धृतराष्ट्र आदिके जन्म तथा भीष्मजीके धर्मपूर्ण शासनसे कुरुदेशकी सर्वांगीण उन्नतिका दिग्दर्शन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.108.6 
धर्मक्रिया यज्ञशीला: सत्यव्रतपरायणा:।
अन्योन्यप्रीतिसंयुक्ता व्यवर्धन्त प्रजास्तदा॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उस समय के लोग सत्यव्रत के पालन में तत्पर होकर स्वभावतः यज्ञों में तत्पर रहते थे और धर्म-कर्म में संलग्न रहकर तथा एक-दूसरे को प्रसन्न रखकर सदैव उन्नति के पथ पर आगे बढ़ते रहते थे ॥6॥
 
The people of that time, being ready to observe the vow of truth, were naturally engaged in performing sacrifices and by remaining engaged in religious activities and keeping each other happy, were always moving ahead on the path of progress. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)