श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 107: माण्डव्यका धर्मराजको शाप देना  »  श्लोक 8-10
 
 
श्लोक  1.107.8-10 
अणीमाण्डव्य इति च ततो लोकेषु गीयते।
स गत्वा सदनं विप्रो धर्मस्य परमात्मवित्॥ ८॥
आसनस्थं ततो धर्मं दृष्ट्वोपालभत प्रभु:।
किं नु तद् दुष्कृतं कर्म मया कृतमजानता॥ ९॥
यस्येयं फलनिर्वृत्तिरीदृश्यासादिता मया।
शीघ्रमाचक्ष्व मे तत्त्वं पश्य मे तपसो बलम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
अणि का अर्थ है भाले का अग्र भाग। उसमें अनुरक्त होने के कारण वे ऋषि तब से समस्त लोकों में अणि-माण्डव्य नाम से विख्यात हुए। एक बार ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण माण्डव्य ने धर्मराज के महल में जाकर उन्हें दिव्य आसन पर बैठे देखा। उस समय उन शक्तिशाली ऋषि ने उन्हें डाँटकर पूछा, 'मैंने अनजाने में ऐसा कौन-सा पाप किया था, जिसके कारण मुझे इस योनि में कष्ट भोगना पड़ रहा है? इसका रहस्य शीघ्र बताओ। फिर मेरे तप का पराक्रम देखो।'॥8-10॥
 
Ani means the front part of the spear. Due to being attached to it, the sage came to be known as Ani-Mandavya in all the worlds from then on. Once, the Brahmin Mandavya, who was the knower of the divine, went to the palace of Dharamraj and saw him sitting on a divine seat. At that time, that powerful sage rebuked him and asked, 'What sin did I commit unknowingly, due to which I have to suffer in this form? Tell me the secret of this quickly. Then see the power of my penance.'॥ 8-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)