श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 107: माण्डव्यका धर्मराजको शाप देना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.107.19 
धर्मे चार्थे च कुशलो लोभक्रोधविवर्जित:।
दीर्घदर्शी शमपर: कुरूणां च हिते रत:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
वे धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र के विद्वान, लोभ और क्रोध से रहित, दूरदर्शी, शांतिप्रिय और कौरवों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहने वाले थे ॥19॥
 
He was a scholar of theology and economics, free from greed and anger, long-sighted, peace-loving and always ready for the welfare of the Kauravas. 19॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अणीमाण्डव्योपाख्याने सप्ताधिकशततमोऽध्याय:॥ १०७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अणीमाण्डव्योपाख्यानविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)