श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 107: माण्डव्यका धर्मराजको शाप देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.107.18 
वैशम्पायन उवाच
एतेन त्वपराधेन शापात् तस्य महात्मन:।
धर्मो विदुररूपेण शूद्रयोनावजायत॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! इस अपराध के कारण महात्मा माण्डव्य के शाप से साक्षात् धर्म ही शूद्रायणों के बीच विचित्र रूप में उत्पन्न हुआ। 18॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! Due to this crime, due to the curse of Mahatma Mandavya, Sakshat Dharma itself was born in a strange form among the Shudrayans. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)