श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 105: व्यासजीके द्वारा विचित्रवीर्यके क्षेत्रसे धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  1.105.26-27 
कामोपभोगेन रहस्तस्यां तुष्टिमगादृषि:।
तया सहोषितो राजन् महर्षि: संशितव्रत:॥ २६॥
उत्तिष्ठन्नब्रवीदेनामभुजिष्या भविष्यसि।
अयं च ते शुभे गर्भ: श्रेयानुदरमागत:।
धर्मात्मा भविता लोके सर्वबुद्धिमतां वर:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
एकान्त में उससे मिलकर महर्षि व्यास अत्यन्त प्रसन्न हुए। हे राजन! कठोर व्रत धारण करने वाले महर्षि जब उसके साथ शयन करके उठे, तब उन्होंने इस प्रकार कहा - 'शुभ! अब तुम दासी नहीं रहोगी। तुम्हारे गर्भ में एक बहुत ही उत्तम बालक आया है। वह संसार के समस्त मुनियों में सबसे अधिक गुणवान और श्रेष्ठ होगा।'॥26-27॥
 
After meeting her in private, Maharishi Vyas was very pleased. O King! When the Maharishi, who was observing a strict vow, got up after sleeping with her, he said thus - 'Shubh! Now you will not be a maid. A very good child has come in your womb. He will be the most virtuous and the best among all the wise men in the world.'॥ 26-27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)