श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 105: व्यासजीके द्वारा विचित्रवीर्यके क्षेत्रसे धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.105.2 
कौसल्ये देवरस्तेऽस्ति सोऽद्य त्वानुप्रवेक्ष्यति।
अप्रमत्ता प्रतीक्षैनं निशीथे ह्यागमिष्यति॥ २॥
 
 
अनुवाद
‘कौशल्ये! तुम्हारा एक देवर है, वह आज गर्भाधान के लिए तुम्हारे पास आएगा। तुम उसकी प्रतीक्षा सावधानी से करो। वह ठीक आधी रात को यहाँ पहुँचेगा।’॥2॥
 
‘Kausalye! You have a brother-in-law, he will come to you today for conception. You wait for him carefully. He will arrive here exactly at midnight.’॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)