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mahabharat 1.104.46: व्यासजी बोले, "माता! यदि मुझे समय की सीमा का पालन किए बिना ही शीघ्र ही अपने भाई को पुत्र प्रदान करना है, तो उन देवियों के लिए यह महान व्रत आवश्यक है, जिससे वे शांत रहें और मेरा कुरूप रूप देखकर भयभीत न हों।"   |   mahabharat अध्याय 1.104: भीष्मकी सम्मतिसे सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे कुरुवंशकी वृद्धिके लिये विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 104: भीष्मकी सम्मतिसे सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे कुरुवंशकी वृद्धिके लिये विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  1.104.46 
व्यास उवाच
यदि पुत्र: प्रदातव्यो मया भ्रातुरकालिक:।
विरूपतां मे सहतां तयोरेतत् परं व्रतम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी बोले, "माता! यदि मुझे समय की सीमा का पालन किए बिना ही शीघ्र ही अपने भाई को पुत्र प्रदान करना है, तो उन देवियों के लिए यह महान व्रत आवश्यक है, जिससे वे शांत रहें और मेरा कुरूप रूप देखकर भयभीत न हों।"
 
Vyasa said, "Mother! If I have to give a son to my brother soon, without keeping the time limit, then this great fast is necessary for those goddesses so that they remain calm and do not get scared after seeing my ugly form." 46.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)