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mahabharat 1.104.35-39h: 'अनघ! उनमें सन्तान उत्पन्न करने तथा राज्य चलाने का तनिक भी विचार नहीं है; अतः अपने भाई के हित को ध्यान में रखते हुए, कुल की सन्तानों की रक्षा के लिए भीष्म के अनुरोध को तथा समस्त प्राणियों पर दया करके उनकी रक्षा करने के उद्देश्य से तथा मेरी आज्ञा से तथा अपने अंतःकरण की कोमल प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, मैं जो कुछ कहूँ, उसे सुनो और उसका पालन करो। तुम्हारे छोटे भाई की पत्नियाँ देवियों के समान सुन्दर और यौवन से परिपूर्ण हैं। उनके मन में धर्मात्मा पुत्र की इच्छा है। बेटा! तुम इसके लिए समर्थ हो, अतः उन दोनों के गर्भ से ऐसी सन्तान उत्पन्न करो, जो इस कुल परम्परा की रक्षा और वृद्धि के लिए पूर्णतः योग्य हों। 35—38 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 1.104: भीष्मकी सम्मतिसे सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे कुरुवंशकी वृद्धिके लिये विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 104: भीष्मकी सम्मतिसे सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे कुरुवंशकी वृद्धिके लिये विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना  »  श्लोक 35-39h
 
 
श्लोक  1.104.35-39h 
बुद्धिं न कुरुतेऽपत्ये तथा राज्यानुशासने।
स त्वं व्यपेक्षया भ्रातु: संतानाय कुलस्य च॥ ३५॥
भीष्मस्य चास्य वचनान्नियोगाच्च ममानघ।
अनुक्रोशाच्च भूतानां सर्वेषां रक्षणाय च॥ ३६॥
आनृशंस्याच्च यद् ब्रूयां तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि।
यवीयसस्तव भ्रातुर्भार्ये सुरसुतोपमे॥ ३७॥
रूपयौवनसम्पन्ने पुत्रकामे च धर्मत:।
तयोरुत्पादयापत्यं समर्थो ह्यसि पुत्रक॥ ३८॥
अनुरूपं कुलस्यास्य संतत्या: प्रसवस्य च।
 
 
अनुवाद
'अनघ! उनमें सन्तान उत्पन्न करने तथा राज्य चलाने का तनिक भी विचार नहीं है; अतः अपने भाई के हित को ध्यान में रखते हुए, कुल की सन्तानों की रक्षा के लिए भीष्म के अनुरोध को तथा समस्त प्राणियों पर दया करके उनकी रक्षा करने के उद्देश्य से तथा मेरी आज्ञा से तथा अपने अंतःकरण की कोमल प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, मैं जो कुछ कहूँ, उसे सुनो और उसका पालन करो। तुम्हारे छोटे भाई की पत्नियाँ देवियों के समान सुन्दर और यौवन से परिपूर्ण हैं। उनके मन में धर्मात्मा पुत्र की इच्छा है। बेटा! तुम इसके लिए समर्थ हो, अतः उन दोनों के गर्भ से ऐसी सन्तान उत्पन्न करो, जो इस कुल परम्परा की रक्षा और वृद्धि के लिए पूर्णतः योग्य हों। 35—38 1/2॥
 
'Anagh! They do not have any idea of procreating children and ruling the kingdom; Therefore, keeping in mind the welfare of your brother, the request of Bhishma for the protection of the lineage of the clan's children, and with the aim of protecting all living beings by having mercy on them and by my command, and keeping in mind the tender nature of your conscience, listen to whatever I say and follow it. Your younger brother's wives are as beautiful as goddesses and full of youth. There is a desire in their mind to have a righteous son. Son! You are capable of this, hence give birth to such children from the womb of both of them, who are fully qualified for the protection and growth of this family tradition. 35—38 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)