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mahabharat 1.104.3: वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! तब सत्यवती ने हँसकर लज्जित होकर भीष्म से इस प्रकार कहा। बोलते समय संकोच के कारण उसका स्वर कुछ अस्पष्ट हो गया।   |   mahabharat अध्याय 1.104: भीष्मकी सम्मतिसे सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे कुरुवंशकी वृद्धिके लिये विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 104: भीष्मकी सम्मतिसे सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे कुरुवंशकी वृद्धिके लिये विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.104.3 
वैशम्पायन उवाच
तत: सत्यवती भीष्मं वाचा संसज्जमानया।
विहसन्तीव सव्रीडमिदं वचनमब्रवीत्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! तब सत्यवती ने हँसकर लज्जित होकर भीष्म से इस प्रकार कहा। बोलते समय संकोच के कारण उसका स्वर कुछ अस्पष्ट हो गया।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! Then Satyavati laughed a little and spoke to Bhishma in this manner while feeling shy. While speaking her voice became somewhat unclear due to hesitation. 3.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)