Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.104.20-23h: वैशम्पायन कहते हैं - महर्षि व्यास का नाम सुनकर भीष्म ने हाथ जोड़कर कहा - 'माते! जो मनुष्य धर्म, अर्थ और काम का बार-बार विचार करता है और यह भी जानता है कि अर्थ से धन की प्राप्ति होती है, धर्म से अधर्म की प्राप्ति होती है और काम से काम की प्राप्ति होती है तथा वह अन्त में किस प्रकार सुखदायी होता है और धन आदि पदार्थों के उपभोग से किस प्रकार विपरीत फल (धन आदि का नाश) होता है। जो धैर्यवान पुरुष इन बातों का पृथक्-पृथक् विचार करके अपनी बुद्धि से उचित-अनुचित का निर्णय करता है, वही बुद्धिमान है। आपने जो कहा है, वह न केवल धर्मसम्मत है, अपितु हमारे कुल के लिए भी हितकर और कल्याणकारी है; इसीलिए वह मुझे बहुत प्रिय है।'॥20-22 1/2॥ | mahabharat अध्याय 1.104: भीष्मकी सम्मतिसे सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे कुरुवंशकी वृद्धिके लिये विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वैशम्पायन उवाच
महर्षे: कीर्तने तस्य भीष्म: प्राञ्जलिरब्रवीत्।
धर्ममर्थं च कामं च त्रीनेतान् योऽनुपश्यति॥ २०॥
अर्थमर्थानुबन्धं च धर्मं धर्मानुबन्धनम्।
कामं कामानुबन्धं च विपरीतान् पृथक् पृथक्॥ २१॥
यो विचिन्त्य धिया धीरो व्यवस्यति स बुद्धिमान्।
तदिदं धर्मयुक्तं च हितं चैव कुलस्य न:॥ २२॥
उक्तं भवत्या यच्छ्रेयस्तन्मह्यं रोचते भृशम्।
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - महर्षि व्यास का नाम सुनकर भीष्म ने हाथ जोड़कर कहा - 'माते! जो मनुष्य धर्म, अर्थ और काम का बार-बार विचार करता है और यह भी जानता है कि अर्थ से धन की प्राप्ति होती है, धर्म से अधर्म की प्राप्ति होती है और काम से काम की प्राप्ति होती है तथा वह अन्त में किस प्रकार सुखदायी होता है और धन आदि पदार्थों के उपभोग से किस प्रकार विपरीत फल (धन आदि का नाश) होता है। जो धैर्यवान पुरुष इन बातों का पृथक्-पृथक् विचार करके अपनी बुद्धि से उचित-अनुचित का निर्णय करता है, वही बुद्धिमान है। आपने जो कहा है, वह न केवल धर्मसम्मत है, अपितु हमारे कुल के लिए भी हितकर और कल्याणकारी है; इसीलिए वह मुझे बहुत प्रिय है।'॥20-22 1/2॥
Vaishampayana says - On hearing the name of Maharishi Vyas, Bhishma said with folded hands - 'Mother! The person who thinks about Dharma, Artha and Kama again and again and also knows how Artha leads to wealth, Dharma leads to Dharma and Kama leads to Kama and how it becomes pleasing in the end and how the consumption of wealth and other things results in the opposite (destruction of wealth etc.). The patient man who decides the right and wrong with his intellect after thinking about these things separately is intelligent. What you have said is not only Dharma-based but is also beneficial and well-being for our clan; that is why I like it very much.'॥ 20–22 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥