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mahabharat 1.104.10: 'भारत! एक ओर तो मैं अपने पिता से भयभीत था, दूसरी ओर ऋषि के शाप से भी भयभीत था। उस समय महर्षि ने मुझे एक दुर्लभ वर देकर मेरा उत्साह बढ़ाया, जिसके कारण मैं उनकी प्रार्थना को अस्वीकार न कर सका॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.104: भीष्मकी सम्मतिसे सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे कुरुवंशकी वृद्धिके लिये विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 104: भीष्मकी सम्मतिसे सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे कुरुवंशकी वृद्धिके लिये विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.104.10 
तमहं शापभीता च पितुर्भीता च भारत।
वरैरसुलभैरुक्ता न प्रत्याख्यातुमुत्सहे॥ १०॥
 
 
अनुवाद
'भारत! एक ओर तो मैं अपने पिता से भयभीत था, दूसरी ओर ऋषि के शाप से भी भयभीत था। उस समय महर्षि ने मुझे एक दुर्लभ वर देकर मेरा उत्साह बढ़ाया, जिसके कारण मैं उनकी प्रार्थना को अस्वीकार न कर सका॥10॥
 
'Bharat! On one hand I was afraid of my father and on the other hand I was also afraid of the sage's curse. At that time Maharishi encouraged me by giving me a rare boon, due to which I could not refuse his request.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)