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mahabharat 1.103.25: हे राजमाता! मैं तुम्हें वह धर्ममय मार्ग बताता हूँ जिससे महाराज शान्तनु की सन्तान का वंश इस पृथ्वी पर चिरस्थायी बना रहे। यही सनातन क्षत्रिय धर्म है॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 1.103: सत्यवतीका भीष्मसे राज्यग्रहण और संतानोत्पादनके लिये आग्रह तथा भीष्मके द्वारा अपनी प्रतिज्ञा बतलाते हुए उसकी अस्वीकृति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 103: सत्यवतीका भीष्मसे राज्यग्रहण और संतानोत्पादनके लिये आग्रह तथा भीष्मके द्वारा अपनी प्रतिज्ञा बतलाते हुए उसकी अस्वीकृति  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.103.25 
शान्तनोरपि संतानं यथा स्यादक्षयं भुवि।
तत् ते धर्मं प्रवक्ष्यामि क्षात्रं राज्ञि सनातनम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
हे राजमाता! मैं तुम्हें वह धर्ममय मार्ग बताता हूँ जिससे महाराज शान्तनु की सन्तान का वंश इस पृथ्वी पर चिरस्थायी बना रहे। यही सनातन क्षत्रिय धर्म है॥ 25॥
 
‘Queen mother! I will tell you the righteous way by which the lineage of Maharaj Shantanu's progeny can remain everlasting on this earth. That is the eternal Kshatriya Dharma.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)